कार्य प्रगति पर है!

छठी कक्षा वाला मोहन, जिसके पेट में होमवर्क से एक रात पहले 'ऐसे-ऐसे' होता था, अब बड़ा हो गया है और मेरे अंदर बिना किराया दिए रहता है।

A black ink drawing of a young man clutching his head, surrounded by floating newspapers and question marks, on a sky-blue background.

तो बात यह है कि जो ‘ऐसे-ऐसे’ हमने छठी कक्षा में पढ़ा था, वो अब बड़ा हो गया है। और जैसे-तैसे हो गया है।

NCERT की हिंदी किताब, विष्णु प्रभाकर जी का नाटक। मोहन ने महीने भर की छुट्टियों में होमवर्क का एक पन्ना नहीं छुआ, और स्कूल खुलने से एक रात पहले पेट पकड़कर तख्त पर लेट गया। माँ ने पूछा, “कैसा दर्द है बेटा?” मोहन बोला, “ऐसे-ऐसे।”

घर में इमरजेंसी लग गई। माँ हींग और चूरन ले आईं। वैद्य जी आए, नब्ज़ देखी, वात बताया, फीस ली। डॉक्टर साहब आए, जीभ देखी, बदहज़मी बताई, फीस ली। फिर मास्टर जी आए और एक सवाल पूछा: “होमवर्क हुआ?” मोहन ने मुँह छिपा लिया, और बीमारी वहीं ठीक हो गई।

ग्यारह साल की उम्र में मुझे मोहन पर बहुत हँसी आई थी। पंद्रह साल बाद पता चल रहा है कि वो हँसी उधार की थी, और अब ब्याज समेत लौटानी है। मोहन कहीं नहीं गया। उसने कंप्यूटर साइंस पढ़ी, नौकरी पकड़ी, और अब मेरे अंदर बिना किराया दिए रहता है।

फर्क बस इतना आया है कि बचपन में ‘ऐसे-ऐसे’ काम न करने का बहाना था। अब बहानों के बीच-बीच में जैसे-तैसे थोड़ा काम हो जाता है।

पहला लक्षण: जिम

मैं जिम जाता हूँ लोहा उठाने। मकसद है वो वज़न घटाना जो मैंने खुद, अपनी मर्ज़ी से, पूरे होशो-हवास में “बस एक रोटी और” कह-कहकर कमाया था। खाना वॉलंटरी था, कसरत भी वॉलंटरी है। फर्क बस इतना है कि खाते वक्त शरीर ने एक बार भी नहीं कहा कि अंदर कुछ ऐसे-ऐसे हो रहा है।

सुबह अलार्म बजते ही शरीर सरकारी दफ्तर बन जाता है। अर्ज़ी जमा है, फाइल आगे नहीं बढ़ती, बाबू कहता है कल आना।

सालों की रिसर्च के बाद मैं इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि इंसानी शरीर अपनी मर्ज़ी से कुछ खोना पसंद नहीं करता। चर्बी पकड़कर रखता है, रज़ाई पकड़कर रखता है। बस एक चीज़ बड़े दिल से लुटाता है: समय।

दूसरा लक्षण: किताबों का ढेर

मेरे साइड प्रोजेक्ट्स अधूरे नहीं हैं। अधूरा होने के लिए पहले शुरू होना पड़ता है।

वो मेरी शेल्फ पर सजी किताबों जैसे हैं। सलीके से लगी हुई, कवर चमकते हुए, मेहमान आएँ तो इंप्रेस हो जाएँ। हर दूसरे दिन मैं उन्हें देखता हूँ और वो मुझे देखती हैं, बड़ी उम्मीद से। हमारा रिश्ता अभी आँखों-आँखों तक ही पहुँचा है।

जब किताब उठाने जाता हूँ, तो अंदर से कुछ रोकता है। पहले इसे आलस कहते थे। अब मैंने इसका नया नाम सीखा है: Internal Friction। सुनने में लगता है जैसे फिज़िक्स की कोई समस्या है जिसे न्यूटन ही आकर हल करेंगे। मैं बेचारा क्या करूँ।

असली खेल यहीं है। आलस को अंग्रेज़ी नाम दे दो तो वो बीमारी बन जाता है, और बीमारी में आराम करना तो डॉक्टर की सलाह है। मोहन यही ट्रिक पंद्रह साल पहले ‘ऐसे-ऐसे’ बोलकर कर रहा था। बस उसका शब्दकोश छोटा था।

तीसरा लक्षण: Go Big or Go Home

जब भी किसी काम का बोरिंग हिस्सा आता है, अंदर का मोहन एक मोटिवेशनल पोस्टर निकाल लाता है: “Go big or go home.” मैंने आज तक कोई बिग काम नहीं किया। होम पर ज़रूर बहुत रहा हूँ।

यह परफेक्शन वाला कीड़ा मुझे पंचतंत्र की उस ग्वालिन की याद दिलाता है। सिर पर दूध का मटका और दिमाग में पूरा बिज़नेस प्लान। दूध बेचूँगी, मुर्गियाँ लूँगी, अंडे बेचूँगी, नई साड़ी लूँगी, और मेले में ऐसे ठुमककर चलूँगी कि सब देखते रह जाएँ। साड़ी उसने दिमाग में पहनी थी, ठुमका असली लगा दिया। मटका गिरा, दूध मिट्टी में।

मेरे हर प्रोजेक्ट का मटका ऐसे ही गिरता है। दिमाग में वो लॉन्च हो चुका है, Product Hunt पर नंबर वन आ चुका है, और मैं किसी पॉडकास्ट पर बैठकर बता चुका हूँ कि “शुरुआत में बहुत स्ट्रगल था।” असलियत में स्ट्रगल अभी शुरू भी नहीं हुआ। ग्वालिन का सपना नकली था, पर दूध का नुकसान असली था। मेरा भी।

चूरन

मोहन को हींग और चूरन मिला था। मेरा चूरन ज़्यादा मॉडर्न है, एक लाइन का है, और रोज़ रात सोने से पहले लेता हूँ:

“कोई बात नहीं, कल से फिर शुरू करेंगे। और इस बार डबल स्पीड से।”

इस चूरन का कोई साइड इफेक्ट नहीं है। इफेक्ट भी नहीं है।

डबल स्पीड वाला हिस्सा सबसे खतरनाक है। इसका मतलब है कि आज का काम भी कल वाले मोहन के खाते में चला गया। बेचारा कल वाला मोहन। उसे आज तक किसी ने देखा नहीं, पर कर्ज़ा सबसे ज़्यादा उसी पर है।

वैद्य जी भी अपडेट हो गए हैं। अब वो YouTube पर बैठते हैं। चालीस मिनट की वीडियो में नब्ज़ देखकर बताते हैं कि आपका dopamine गड़बड़ है, और इलाज है उनका नया कोर्स। फीस अब भी लेते हैं, बस अब उसे watch time कहते हैं।

मास्टर जी

नाटक में मोहन को मास्टर जी ने पकड़ा था। मुझे लगता था मेरे पास कोई मास्टर जी नहीं हैं। गलत लगता था।

मास्टर जी अब भी आते हैं, साल में एक बार, केक लेकर। हर जन्मदिन पर केक पर एक मोमबत्ती और बढ़ जाती है, और वो मोमबत्ती बिना कुछ बोले वही सवाल पूछती है: “होमवर्क हुआ?”

मोहन को मास्टर जी ने होमवर्क पूरा करने के लिए दो दिन दिए थे। मुझे कितने दिन मिले हैं, यह किसी ने बताया नहीं। नाटक का यही हिस्सा मुझे सबसे कम मज़ेदार लगता है।

तब तक मेरी ज़िंदगी के बाहर वही पीला बोर्ड टंगा है जो हर सरकारी सड़क पर लगा रहता है: कार्य प्रगति पर है। उस पर भरोसा कोई नहीं करता, पर उसे हटाता भी कोई नहीं।

वैसे यह ब्लॉग पूरा हो गया है। लिखते वक्त पेट में तीन-चार बार ऐसे-ऐसे हुआ। इस बार मैंने चूरन नहीं लिया, पब्लिश दबा दिया।